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गुरुवार, 2 अगस्त 2012


ये ऊंचे महलों वाले कितने ग़रीब होते हैं
घर के बाहर इनके भूख से बच्‍चे रोते हैं


जिंदगी इनकी भी गुजर जाती है यूं ही
ये और बात हैं कि ये जरा बदनसीब होते हैं


तेरी रहनुमाई में यह सब हो रहा है खु़दा
तू ही बता तेरी दुनिया में लोग ऐसे क्‍यों होते हैं


ग़म की सिलाईयों का इन पर असर नहीं होता
अपनी मैय्यत को ये खुद अपने कांधों पर ढोते हैं


चंद गमगीन लम्‍हें जो न गुजार सके साथ तेरे
ऐसे लोगों के पास उम्र भर के वादे होते हैं


चांद रात भी इतनी स्‍याह हो चली है आजकल
हर इक मोड़ पर यहां उल्‍लू रोते हैं


दूर कहीं रोशनी नजर आती तो है
थोड़ा सब्र करो उजाला बस होने को है

सोमवार, 7 सितंबर 2009

... हम तो चाहत के गम उठाए जीते हैं

हम तो चाहत के गम उठाए जीते हैं,
आंसू जुदाई के दिन रात पीते हैं।
दुनिया में हमारा कोई नहीं हैं अपना,
आंखों में मेरी कोई न कोई है सपना।
बस उम्‍मीद के दीए जलाए जीते हैं,
हम तो चाहत के गम उठाए जीते हैं।

इश्‍क में न हार और न जीत का अहसास होता है,
महबूब का दिया हर जख्‍म भी खास होता है।
दूरियों की मोहताज मोहब्‍बत नहीं होती,
जुदाई में जो मिट जाए वो चाहत नहीं होती।
हम उनकी याद सीने में बसाए जीते हैं,
हम तो चाहत के गम उठाए जीते हैं।

बंदगी बस उसी की करते हैं हम,
मेरा ख़ुदा ही है मेरा सनम।
चाहकर भी उन्‍हें भुला न पाएंगे,
मरकर भी वो हमें याद आएंगे।
उनकी याद के लम्‍हें दिल में पलते हैं,
हम तो चाहत के गम उठाकर जीते हैं।

हमें छोड़कर जाना उनकी रजा सही,
मोहब्‍बत के बदले हमारी यह सजा सही।
एक दिन तो उन्‍हें हमारी मोहब्‍बत का अहसास होगा,
जब कोई अपना न दिल के पास होगा।
उस दिन की आस लिए जीते हैं,
हम तो चाहत के गम उठाकर जीते हैं।

गुरुवार, 4 जून 2009

बस तुम ही तो हो..

बस तुम ही तो जिसे देखकर दिल को धड़कना याद आता है
तुम ही तो जिसे छूकर मुझे मेरे होने का अहसास आता है
हां सच में वो तुम ही हो जिसकी आवाज मेरे सांसो की तार है
सच वो तुम ही हो जो मुझमें मुझसे ज्‍यादा रहता है

मैं तुमसे अलग नहीं हो सकता
क्‍योंकि फिर मिट जाएगा मेरा खुद का वजूद
मैं, मैं जो नहीं हूं, कब का तुम हो चुका हूं
बस तुम ही तो हो जो मेरे जीवन का आधार है।

अब भला तुम्‍हें क्‍या बताऊं तुम क्‍या हो
गर्मी में तपती जमीं पर पड़ती बारिश की पहली बूंद सी तुम
खून जाने वाली सर्द हवाओं के बीच
एक नर्म आलिंग्‍न के आनंद सी तुम

बस, तुम और तुम ही हो
जिसके साथ पूरी उम्र बिताना चाहता हूं
मगर, जानता हूं कि यह सिर्फ मेरा इरादा है
तुम्‍हारा नहीं, तुम्‍हारे लिए तो मैं सिर्फ एक परिचित भर हूं
एक परिचि‍त , जिसे अपना परिचय ही नहीं मालूम

भारत मल्‍होत्रा

गुरुवार, 26 मार्च 2009

यादों का संदूक...

मेरे दिल के कमरे में एक संदूक रखा है

जिसमें बंद हैं कई चीजें,

और, अच्‍छा ही है हमारे लिए कि वो बंद ही रहे

रखे है उनमें हमारी जिंदगी के कई खूबसूरत पल

वो मिलन की बातें, वो जागती रातें,

साथ ही बंद हैं, एक चुटकी आंसू और ढ़ेर सारी हंसी

उन्‍हें बंद ही रहने दो, क्‍योंकि हंसी तो फौरन फैल जाती है

और, फिर लग जाती है उसे जमाने की नजर

बंद है उसमें, कुछ गम और ढेर सारे सुख

सुख... जो तुम्‍हारी सांसों की महक से ताजा हैं अब तक

तो, अच्‍छा है.... बंद ही रहने दो उस संदूक को

क्‍योंकि, बाहर की हवा से सड़ने लग जाएंगे वो पल

संदूक, जिस पर तुम्‍हारे प्‍यार का ताला लगा है

और, चाबी है तुम्‍हारी यादें....

भारत मल्‍होत्रा

सोमवार, 23 मार्च 2009

आपकी चाहत...

जिस्‍म जुदा होते हैं, रूह नहीं ।
क्‍या हुआ जो आप हमसे रू-‍ब-रू नहीं ।।

आपकी यादें ताउम्र दिल में महकती रहेंगी ।
पल में उड़ जाए, ये वो खुशबू नहीं ।।

साथ रहकर भी रह गयी दूरियां ।
कुछ तो कमी हमारी मोहब्‍बत में रही ।।

दिल के जख्‍म बहुत गहरे लगे हैं।
अब किसी हाल में होंगे ये रफू नहीं ।।

तुम्‍हें मिल जाए, जिसकी चाहत है तुम्‍हें ।
हाथ उठाकर खुदा से अब बस दुआ है यही ।।

तेरी याद में अब बहुत रो चुका हूं मैं ।
तुझे पाने की दिल में अब कोई चाहत न रही ।।

भारत मल्‍होत्रा